दशमहाविद्या स्तोत्र | DasMahavidhya Stotra Kavach Stuti

॥ श्री दशमहाविद्या स्तोत्र संग्रह (विस्तृत अर्थ सहित) ॥

१. श्री दशमहाविद्या स्तुति (भक्ति एवं सुरक्षा)

१. नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनि ॥ १ ॥

विस्तार में अर्थ: हे चण्डिके! आप प्रचंड शक्ति की स्वामिनी हैं। चण्ड और मुण्ड नामक असुरों (जो हमारे भीतर के अहंकार और तामसिक विचारों के प्रतीक हैं) का विनाश करने वाली देवी, आपको मेरा सादर नमस्कार है। हे माता कालिका! आप समय (काल) की अधिष्ठात्री हैं और मृत्यु के सबसे बड़े भय को भी जड़ से मिटा देने वाली हैं। आपकी शरण में आने पर काल का डर भी समाप्त हो जाता है।

२. शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरिवल्लभे ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम् ॥ २ ॥

विस्तार में अर्थ: हे शिव की शक्ति (शिवे)! हे पूरे जगत को अपनी गोद में धारण करने वाली माँ जगद्धात्री, मेरी रक्षा करें। हे भगवान विष्णु की प्रिय (हरि-वल्लभे), मुझ पर अपनी प्रसन्नता और कृपा बनाए रखें। मैं उस आदि-शक्ति को प्रणाम करता हूँ जो पूरे संसार का नियम से पालन-पोषण करती हैं। जब आप रक्षक हैं, तो भक्त कभी असहाय महसूस नहीं कर सकता।

३. जगत्क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम् ।
करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम् ॥ ३ ॥

विस्तार में अर्थ: आप वह महान विद्या हैं जो अधर्म होने पर पूरे जगत में हलचल (क्षोभ) पैदा कर देती हैं, और आप ही इस सुंदर सृष्टि की रचना करने वाली हैं। आपका स्वरूप शत्रुओं और दुष्टों के लिए अत्यंत कराला (विशाल) और घोरा (भयानक) है। आपने जो मुण्डमाला धारण की है, वह इस बात का प्रतीक है कि अंत में सब कुछ आप ही की चेतना में विलीन हो जाना है।

४. हरार्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम् ।
गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालंकारभूषिताम् ॥ ४ ॥

विस्तार में अर्थ: हे देवी, जिनकी पूजा और आराधना स्वयं महादेव (हर) करते हैं, उन महादेव की अर्धांगिनी को मैं नमन करता हूँ। आप माँ 'गौरी' हैं, जिन्हें गुरु-भक्ति और अनुशासन अत्यंत प्रिय है। आप अपने दिव्य गौरवर्ण और सुंदर स्वर्णिम आभूषणों से सुसज्जित हैं। यह स्वरूप भक्त के जीवन में शांति और सुंदरता लेकर आता है।

५. हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम् ।
सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरगणैर्युताम् ॥ ५ ॥

विस्तार में अर्थ: भगवान विष्णु की प्रिय और इस अनंत संसार को अपनी माया से चलाने वाली 'महामाया' को मैं प्रणाम करता हूँ, जिनकी पूजा स्वयं ब्रह्मा जी करते हैं। आप समस्त सिद्धियों की स्वामिनी (सिद्धेश्वरी) हैं। सभी सिद्ध पुरुष, देवता और गन्धर्व सदैव आपकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। आपकी कृपा से मनुष्य के असंभव कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।

६. तारां च उग्रतारां च नीलसरस्वतीं पराम् ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम् ॥ ६ ॥

विस्तार में अर्थ: मैं माता तारा, उनके शक्तिशाली रूप 'उग्रतारा' और परम ज्ञान व वाणी की अधिष्ठात्री 'नील-सरस्वती' को प्रणाम करता हूँ। हे माँ, आप ही इस ब्रह्मांड को सहारा देने वाली हैं। आपकी करुणा भक्तों को घोर संकटों से बाहर निकालती है और बुद्धि को प्रखर बनाती है।

७. ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः पूजितां परमेश्वरीम् ।
नमामि जगतां धात्रीं भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् ॥ ७ ॥

विस्तार में अर्थ: हे परमेश्वरी! ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे महान देवता भी सदैव आपके चरणों में शीश नवाते हैं। आप पूरे विश्व का आधार हैं। आप ही वह करुणावान देवी हैं जो अपने भक्तों को इस संसार के सभी सुख, धन और ऐश्वर्य (भुक्ति) भी देती हैं और अंत में परम शांति व मोक्ष (मुक्ति) का वरदान भी देती हैं।

८. दशविद्यामयीं देवीं दशदिक्पालरुपिणीम् ।
नमामि जगतां धात्रीं सर्वसिद्धिप्रदायिनीम् ॥ ८ ॥

विस्तार में अर्थ: आप साक्षात् दसों महाविद्याओं का ही स्वरूप हैं और दसों दिशाओं की रक्षा करने वाली रक्षक (दिक्पाल) भी आप ही हैं। मैं उन जगत-माता को नमन करता हूँ जो अपने साधक को हर दिशा और हर प्रयास में 'सिद्धि' (पूर्ण सफलता) प्रदान करती हैं।

९. अज्ञाननाशिनि देवि ज्ञानविज्ञानदायिनीम् ।
नमामि जगतां धात्रीं सर्वसौभाग्यदायिनीम् ॥ ९ ॥

विस्तार में अर्थ: हे देवी! आप हमारे मस्तिष्क के अंधेरे और अज्ञान को मिटाने वाली हैं। आप ही हमें सांसारिक ज्ञान और गहरा आध्यात्मिक विज्ञान प्रदान करती हैं। मैं उन माँ को बार-बार प्रणाम करता हूँ जो अपने भक्तों को 'सर्व-सौभाग्य' प्रदान करती हैं।

१०. इति एता दशविद्याश्च सर्वकामफलप्रदाः ।
यः पठेत् प्रयतो भूत्वा तस्य सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥ १० ॥

विस्तार में अर्थ: इस प्रकार, जो भी मनुष्य इन दसों महाविद्याओं के इस पवित्र स्तोत्र का पाठ करता है, उसकी सभी इच्छाएं (सर्व-काम) फलित होती हैं। जो व्यक्ति शुद्ध होकर इसका अभ्यास करता है, उसे निश्चित रूप से (ध्रुवम्) सफलता और सिद्धि प्राप्त होती है।

११. न तस्य दुर्लभं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
यः पठेत् सततं भक्त्या दशविद्यास्तवं शुभम् ॥ ११ ॥

विस्तार में अर्थ: जो मनुष्य निरंतर और पूरी श्रद्धा के साथ इस शुभ 'दशमहाविद्या स्तोत्र' का पाठ करता है, उसके लिए इस पूरे ब्रह्मांड में कुछ भी हासिल करना कठिन नहीं रह जाता। माँ की कृपा से उसे वह सब कुछ मिल जाता है जिसकी वह कामना करता है।

२. मुण्डमाला तंत्रोक्त स्तोत्र (विस्तृत ध्यान)

१. करालवदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम् । कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमाला विभूषिताम् ॥

विस्तार में अर्थ: भयानक मुख वाली, खुले और बिखरे हुए केशों वाली तथा चार भुजाओं वाली माता दक्षिणा काली का मैं ध्यान करता हूँ। उन्होंने अपने गले में मुण्डों की माला धारण की है, जो इस बात का प्रतीक है कि वे समय और मृत्यु के भय को नष्ट कर साधक को अभय प्रदान करती हैं।

२. अतसीपुष्पसंकाशां शवयन्मोपरिस्थिताम् । तारां नीलसरस्वतीं भजेहं भवतारिणीम् ॥

विस्तार में अर्थ: अलसी के नीले फूल के समान आभा वाली, शव के ऊपर स्थिर होकर खड़ी माता तारा और नील-सरस्वती का मैं भजन करता हूँ। वे संसार रूपी सागर से तारने वाली (भवतारिणी) हैं और अपने भक्तों को कठिन परिस्थितियों से बाहर निकालकर सर्वोच्च ज्ञान प्रदान करती हैं।

३. बालार्कमाण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् । पाशांकुशधनुर्बाणान् धारयन्तीं शिवां भजे ॥

विस्तार में अर्थ: प्रातःकाल के उगते सूर्य के समान तेज और कांति वाली, तीन नेत्रों और चार भुजाओं वाली माता षोडशी का मैं ध्यान करता हूँ। उन्होंने अपने हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण किए हुए हैं, जो मन पर नियंत्रण और इच्छाओं की पूर्ति का संकेत देते हैं।

४. उद्यद्दिनकरद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयनत्रययुक्ताम् । स्मेरमुखीं वरदांकुशपाशाभीतिकरां प्रबजे भुवनेशीम् ॥

विस्तार में अर्थ: हजारों सूर्यों की चमक वाली, मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट धारण करने वाली और तीन नेत्रों वाली माता भुवनेश्वरी की मैं शरण लेता हूँ। उनके चेहरे पर मंद मुस्कान है और वे अपने हाथों में वरदान, अंकुश, पाश और अभय मुद्रा धारण कर पूरे ब्रह्मांड का संचालन करती हैं।

५. वन्दे वन्दिताशोषदेवमुनिभिर्भर्गोज्ज्वलां भैरवीम् ॥

विस्तार में अर्थ: समस्त देवताओं और ऋषियों द्वारा पूजित, अग्नि के समान प्रज्वलित तेज वाली माता भैरवी की मैं वंदना करता हूँ। वे साधक के भीतर के भय और आलस्य को जलाकर उसे साहस और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती हैं।

६. छिन्नमस्तां भजे शुभ्रवर्णविलसत्कान्तिं महाशक्तिणीम् ॥

विस्तार में अर्थ: अपने ही कटे हुए मस्तक को धारण करने वाली और अत्यंत दिव्य श्वेत कांति वाली माता छिन्नमस्ता का मैं ध्यान करता हूँ। उनका यह रूप जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझने और काम-वासनाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक है।

७. विवर्णा चंचला दुष्टा दीर्घा च मलिनाम्बरा । विधवा विरलद्विजा धूमावती नमस्तुते ॥

विस्तार में अर्थ: बिना किसी वर्ण वाली, मैले वस्त्र धारण करने वाली और विधवा रूप में कौवे पर सवार माता धूमावती को नमस्कार है। वे जीवन के अभावों, दुखों और दरिद्रता को नष्ट कर साधक को वैराग्य और धैर्य की अद्भुत शक्ति प्रदान करती हैं।

८. पीताम्बराभरणमाल्यविभूषितांगीं देवीं भजामि धृतमुद्गरवैरिजिह्वान् ॥

विस्तार में अर्थ: पीले वस्त्रों, आभूषणों और पुष्पों से सुसज्जित शरीर वाली माता बगलामुखी का मैं भजन करता हूँ। वे अपने हाथ में शत्रु की जिह्वा (जीभ) थामे हुए हैं और मुदगर (गदा) धारण किए हुए हैं, जो विरोधियों को स्तंभित करने और हर विवाद में विजय दिलाने की क्षमता रखती हैं।

९. मातंगीं मधुपानमत्तहृदयां नीलाम्बराभास्वरं, संगीतश्रुतिशालिनीं भगवतीं भक्तार्तिविध्वंसिनीम् ॥

विस्तार में अर्थ: नीले वस्त्रों वाली, संगीत और कला में निपुण माता मातंगी का मैं ध्यान करता हूँ। वे ज्ञान और आकर्षण की देवी हैं, जो अपने भक्तों के मानसिक और शारीरिक कष्टों का समूल नाश कर उन्हें समाज में मान-सम्मान और प्रभावशाली वाणी प्रदान करती हैं।

१०. बिभ्राणां वरमब्जयुग्ममभयं हस्तैः किरीटोज्ज्वलां, वन्देऽरविन्दस्थितां कमलां महालक्ष्मीम् ॥

विस्तार में अर्थ: खिले हुए कमल के आसन पर विराजमान, हाथियों द्वारा स्वर्ण कलशों से अभिषिक्त माता कमला (महालक्ष्मी) को मैं प्रणाम करता हूँ। वे हाथ में कमल और अभय मुद्रा धारण कर भक्तों के जीवन से दरिद्रता का अंत करती हैं और उन्हें सुख-समृद्धि से परिपूर्ण करती हैं।

३. श्री दशमहाविद्या कवच (विस्तृत अंग रक्षा)

१. ॐ शिरो मे पातु मातंगी, भालं पातु महेश्वरी । नयने पातु वाराही, कर्णौ पातु च चण्डिका ॥

विस्तार में अर्थ: बुद्धि की अधिष्ठात्री माता मातंगी मेरे सिर की रक्षा करें। आदि-शक्ति महेश्वरी मेरे ललाट (माथे) की रक्षा करें। वाराही देवी मेरे दोनों नेत्रों की और चण्डिका माता मेरे कानों की हर प्रकार की नकारात्मकता से रक्षा करें।

२. नासिकां पातु कौमारी, मुखं पातु च भैरवी । जिह्वां पातु जगद्धात्री, कण्ठं पातु च कालिका ॥

विस्तार में अर्थ: देवी कौमारी मेरी नासिका की रक्षा करें। माता भैरवी मेरे मुख की रक्षा करें। संसार को धारण करने वाली जगद्धात्री मेरी जिह्वा की रक्षा करें ताकि मेरी वाणी शुद्ध हो, और माता कालिका मेरे कंठ की रक्षा करें।

३. सर्वांगं पातु पार्वती सर्वसिद्धिप्रदायिनी ॥

विस्तार में अर्थ: समस्त सिद्धियों को देने वाली माता पार्वती मेरे शरीर के प्रत्येक अंग, प्रत्येक रोम और मेरी पूरी चेतना की सदैव रक्षा करें।

४. मंत्रात्मक स्तोत्र (विस्तृत फलश्रुति)

१. काली शत्रुविनाशाय तारा दारिद्र्यहारिणी । षोडशी सुखदात्री च भुवनेश्वरी शुभप्रदा ॥

विस्तार में अर्थ: माता काली शत्रुओं का नाश करती हैं। माता तारा घोर दरिद्रता मिटाती हैं। माता षोडशी सुख प्रदान करती हैं और भुवनेश्वरी देवी हर कार्य में शुभता लेकर आती हैं।

२. भैरवी भयनाशाय छिन्नमस्ता च सिद्धिदा । धूमावती शत्रुनाशाय बगला मुखस्तम्भिनी ॥

विस्तार में अर्थ: भैरवी माता भय मिटाती हैं। छिन्नमस्ता देवी सिद्धि प्रदान करती हैं। धूमावती माता विरोधियों के षड्यंत्रों को नष्ट करती हैं और माता बगलामुखी शत्रुओं को स्तंभित कर विजय दिलाती हैं।

३. मातंगी वाक्प्रदात्री च कमला सम्पदाप्रदा । इत्येता दशविद्याश्च सर्वकामफलप्रदाः ॥

विस्तार में अर्थ: माता मातंगी ज्ञान और वाणी प्रदान करती हैं। माता कमला (महालक्ष्मी) धन और सम्पदा देती हैं। ये दसों विद्याएं हर मनोकामना पूरी करने वाली शक्तियां हैं।

॥ इति श्री दशमहाविद्या स्तोत्र संग्रहः सम्पूर्णम् ॥

About the author

D Shwari
I'm a professor at National University's Department of Computer Science. My main streams are data science and data analysis. Project management for many computer science-related sectors. Next working project on Al with deep Learning.....

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